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सरसों: फसल में रोग एवं कीट संक्रमण से बचाव के लिए “समेकित कीट प्रबंधन” विधि

सरसों: फसल में रोग एवं कीट संक्रमण से बचाव के लिए “समेकित कीट प्रबंधन” विधि

लेखक - Lohit Baisla | 20/11/2022

फसलों के पैदावार को बढाने एवं उसे टिकाऊ बनाने के लिए सरसों में “आईपीएम” अथवा “समेकित कीट प्रबंधन” विधि एक प्रचलित प्रणाली है। सरसों की फसल में अत्यधिक कीट संक्रमण फसल में लगभग 20 से 90 % तक उत्पादन हानि का कारण बन सकता है। जिनमें चेपा, माहू, काले धब्बों का रोग, झुलसा रोग, सफ़ेद रतुआ, मृदुरोमिल आसिता (मिल्ड्यू) आदि सब कीट और बीमारी प्रमुख हैं।

सरसों में आने वाली ये समस्याएं पौधे के तने, पत्ते, फलियां एवं उत्पादन के साथ ही अन्य आर्थिक भाग को भी प्रभावित करती हैं। जिनसे बचने के लिए कीट व रोगाणु के प्रकोप के लक्षण को समझकर समय पर उचित उपचार प्रबंधन ही एकमात्र तरीका होता है। कीट, कवक या रोगाणु के आधार पर ये उपचार रासायनिक के साथ ही यांत्रिक अथवा निवारक हो सकते हैं। इसके साथ ही फसल में प्रबंधन से जुड़ी केवल कुछ ही निम्नलिखित बिंदुओं का पालन कर भी फसल में अधिक हानि होने से बचाया जा सकता है।

बुवाई के पूर्व प्रबंधन

  • खेत की अच्छी तरह से जुताई करें।

  • खेत में पानी की निकासी के लिए उचित प्रबंधन रखें।

  • फसलों के अवशेषों को नष्ट कर दें एवं रोग ग्रसित पौधों को एकत्र करके जला दें। इसके साथ ही खेत को खरपतवार से मुक्त रखें।

  • रोगाणुओं की जीवन चक्र को समाप्त करने के लिए वार्षिक फसल चक्र को अपनाएं ।

  • सरसों में मिट्टी जांच के बाद आवश्यकता अनुसार संतुलित उर्वरक का ही प्रयोग करें और अधिक नाइट्रोजन उर्वरक के उपयोग से बचें।

  • जिंक सल्फेट या सल्फर के उर्वरक का प्रयोग सरसों के पौधे की उचित विकास एवं अधिक तेल की मात्रा के लिए करें।

बिजाई के दौरान, रखें इन बातों का ध्यान

  • सरसों की बुवाई सही समय पर पूरी कर दें।

  • सरसों फसल क्षेत्र के लिए स्वीकृत, उन्नत एवं रोग रहित प्रमाणित बीजों का ही प्रयोग करें।

  • बुवाई से पूर्व बीज उपचार अवश्य करें अपनाएं।

  • भूमि या मृदा उपचार के द्वारा बीमारियों का प्रकोप कम होता है। इसलिए ट्राईकोडरमा कवक 1 किलोग्राम प्रति एकड़ के दर से पकी हुई गोबर में मिलाकर सरसों की बुवाई से पूर्व भूमि में अवश्य मिलाएं।

  • बुवाई के समय सरसों की किस्मों के अनुसार कतार से कतार एवं पौधे से पौधे की उचित दूरी का अवश्य ध्यान रखें।

वानस्पतिक अवस्था में प्रबंधन

  • सरसों फसल में माहू के प्रकोप से प्रभावित भागों को प्रारम्भिक अवस्था में तोड़कर स्वस्थ पौधों से अलग कर दें।

  • माहू के संतुलन के लिए 1.32 मिलीलीटर डाइमेथोएट की मात्रा को 1 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें।

  • फसल में आवश्यकतानुसार 2 से 3 सिंचाई, फूल आते समय, फली बनते समय एवं दाना भरते समय करें।

फूल व फली अवस्था में प्रबंधन

  • सरसों के खेत में नियमित रूप से निरीक्षण करते रहें। कोई भी हानिकारक कीट दिखने पर उसे नष्ट कर दें|

  • सफ़ेद रतुआ जैसे रोग के अधिक प्रकोप के रोकथाम के लिए मेटलेक्सिल 4% + मैंकोजेबम 64 % WP की 2.5 ग्राम मात्रा को एक लीटर पानी में  घोलकर प्रति एकड़ के दर से छिड़कें।

  • समय- समय पर सरसों के खेत से खरपतवार निकालते रहें एवं कीटनाशकों का प्रयोग शाम के समय ही करें।

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सरसों की फसल में समय-समय पर लगने वाले कीट एवं रोग का प्रबंधन फसल से बेहतर उत्पादन प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे में जरूरी है कि आप फसल में आने वाली किसी भी प्रकार की समस्या की रोकथाम एवं प्रबंधन के लिए टॉल फ्री नंबर 1800 1036 110 के माध्यम से देहात के कृषि विशेषज्ञों से जुड़कर उचित सलाह लें और समय पर अपनी फसल का बचाव करें। आप अपने नज़दीकी देहात केंद्र से जुड़कर और हाईपरलोकल सुविधा से उर्वरक एवं कीटनाशक खरीद जैसी सुविधा का फायदा भी उठा सकते हैं। अधिक जानकारी के लिए जुड़े रहें देहात से।

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