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नींबू वर्गीय पौधों में लगने वाले कुछ प्रमुख रोग एवं नियंत्रण के उपाय

Author : Surendra Kumar Chaudhari

नींबू, मीठा नींबू, संतरा, माल्टा, मौसंबी, सभी नींबू वर्गीय पौधों में शामिल हैं। विटामिन सी से भरपूर इन फलों के सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है। लेकिन कई बार यह फल भी अनेक रोगों से प्रभावित हो जाते हैं। आइए नींबू वर्गीय पौधों में लगने वाले कुछ प्रमुख रोग की जानकारी प्राप्त करें।

कुछ प्रमुख रोग

  • सिट्रस ट्रिस्टेजा : नींबू वर्गीय पौधों में लगने वाले रोगों में यह सबसे घातक रोग है। यह एक विषाणु जनित रोग है। गर्मी के मौसम में तापमान बढ़ने पर इस रोग का प्रकोप अधिक होता है। रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियां पीली होने लगती हैं। पौधों में पोषक तत्वों की कमी के लक्षण नजर आने लगते हैं। कुछ वर्षों में पौधे पूरी तरह सूख जाते हैं। एफिड इस रोग को अन्य पौधों में फैलाने का काम करती हैं। इस रोग से बचने के लिए रोग से प्रभावित पौधों के कलम का प्रयोग न करें। इस रोग पर नियंत्रण के लिए प्रति लीटर पानी में 1 मिलीलीटर डायमेथोएट 30 ई.सी. मिलाकर छिड़काव करें।

  • कैंकर रोग : यह विषाणु के द्वारा फैलने वाला रोग है। वर्षा के मौसम में इस रोग का प्रकोप अधिक होता है। इस रोग से प्रभावित पौधों के फलों के साथ पत्तियों एवं शाखाओं पर भी पीले रंग के धब्बे उभरने लगते हैं। रोग बढ़ने के साथ यह धब्बे छालों में बदलने लगते हैं। इस रोग को फैलने से रोकने के लिए पौधों के प्रभावित हिस्सों को काटकर नष्ट कर दें। काटे हुए शाखाओं पर बोर्डों पेस्ट का लेप लगाएं। रोग से निजात पाने के लिए प्रति लीटर पानी में 2 ग्राम मैंकोजेब मिलाकर छिड़काव करें।

  • हरीतिमा रोग : इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियां ऊपर की तरफ बढ़ती है एवं पत्तियों का आकार छोटा हो जाता है। पत्तियों की नसें हरी एवं शेष पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं। पौधों के विकास में बाधा आती है। प्रभावित पौधों के फलों का स्वाद खराब हो जाता है और फल विकृत आकार के हो जाते हैं। प्रति लीटर पानी में 1 मिलीलीटर डायमेथोएट 30 ई.सी. मिलाकर छिड़काव करने से इस रोग पर आसानी से नियंत्रण किया जा सकता है। आवश्यकता होने पर 20 दिनों के अंतराल पर दोबारा छिड़काव करें।

  • गमोसिस रोग : यह रोग फाइटोप्थोरा नामक कवक के कारण होता है। इस कवक का बीजाणु मिट्टी में लंबे समय तक जीवित रहता है। इस रोग के होने पर पौधों के तने से गोंद निकलने लगती है। पौधों की जड़ें एवं तना सड़ने लगता है और पत्तियां पीली होकर सूखने लगती हैं। इस रोग पर नियंत्रण के लिए प्रति लीटर पानी में 2.5 ग्राम रिडोमिल एम.जेड. 72 मिलाकर छिड़काव करें। आवश्यकता होने पर 40 दिनों के अंतराल पर दोबारा छिड़काव करें।

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19 May 2021

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