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गिलोय की बढ़ी मांग, इस तरह खेती कर करें आपूर्ति

Author : Surendra Kumar Chaudhari

गिलोय एक लताओं वाला पौधा है। गिलोय कई औषधीय गुणों से भरपूर है। विभिन्न क्षेत्रों में इसे अमृता, अमृत बेल, छिन्ना, गुर्च, गुड़ची, गुलबेल, छिन्नोद्रवा, छिन्नकहा, चक्रांगी, शिंडिलकोडि, टिप्पारिगो, गिलव, आदि कई नामों से जाना जाता है। इसकी जड़, पत्तियां एवं फल सभी का उपयोग किया जाता है। लेकिन पौधों के तने की मांग अधिक होती है। इसकी खेती भारत के लगभग सभी क्षेत्रों में की जा सकती है।

गिलोय के पत्ते पान के पत्तों की तरह नजर आते हैं। इसके पुराने तने करीब 2 से 3 सेंटीमीटर व्यास तक मोटे हो जाते हैं। कई बार इसकी बेल आम, नीम आदि वृक्षों के सहारे ऊपर फैलती हैं। अन्य वृक्षों की तुलना में नीम के वृक्षों पर चढ़ाए गए गिलोय को उत्तम मन जाता है। इससे गिलोय के पौधों में नीम के गुण भी शामिल हो जाते हैं। इस तरह के गिलोय को नीम गिलोय कहा जाता है।

बात करें इसकी खेती की तो पिछले कुछ वर्षों में गिलोय की मांग में भारी बढ़ोराती हुई है। बढ़ती मांग को देखते हुए इसकी खेती किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। आइए इस पोस्ट के माध्यम से हम गिलोय की खेती पर विस्तार से जानकारी प्राप्त करें।

गिलोय की खेती कैसे की जाती है?

  • इसकी खेती पौधों की कटिंग यानी कलम की रोपाई के द्वारा की जाती है।

  • विभिन्न किस्मों के अनुसार प्रति एकड़ भूमि में इसकी खेती के लिए 1,000 से 2,000 कलम की आवश्यकता होती है।

गिलोय की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी

  • इसकी खेती विभिन्न तरह की मिट्टी में की जा सकती है।

  • बेहतर पैदावार के लिए इसकी खेती बलुई दोमट मिट्टी में करनी चाहिए।

खेत की तैयारी एवं पौधों की रोपाई

  • गिलोय की खेती के लिए सबसे पहले खेत में एक बार गहरी जुताई करें।

  • इसके बाद 2 से 3 बार हल्की जुताई कर के मिट्टी को भुरभुरी बना लें।

  • बेहतर पैदावार के लिए खेत में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाएं।

  • इसके बाद कलम की रोपाई के लिए खेत में क्यारियां तैयार करें।

  • सभी क्यारियों के बीच 1.5 से 2 मीटर की दूरी रखें।

  • पौधों से पौधों के बीच करीब 50 सेंटीमीटर दूरी रखें।

सिंचाई एवं खरपतवार नियंत्रण

  • कलम की रोपाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें।

  • वर्षा के मौसम में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है।

  • सामान्यतौर पर 15 से 20 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की जाती है।

  • गर्मी एवं ठंड के मौसम में आवश्यकता के अनुसार सिंचाई करें।

  • खरपतवारों पर नियंत्रण के लिए कुछ समय के अंतराल पर निराई-गुड़ाई करें।

फसल की कटाई एवं पैदावार

  • जब पौधों के तने की मोटाई करीब 2.5 सेंटीमीटर हो जाए तब पौधों की कटाई की जाती है।

  • कटाई के बाद तने से फिर नए पौधे निकलने लगते हैं।

  • कटाई के बाद तनों के छोटे टुकड़ों में काट कर छांव में सुखाएं।

  • हर 2 वर्षों में प्रति एकड़ भूमि से 600 किलोग्राम ताजे तने प्राप्त किए जा सकते हैं।

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6 September 2021

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