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धनिया : बेहतर पैदावार के लिए करें इन किस्मों की खेती

धनिया : बेहतर पैदावार के लिए करें इन किस्मों की खेती

लेखक - Surendra Kumar Chaudhari | 4/11/2021

धनिया की खेती इसकी हरी पत्तियों एवं दानों के लिए की जाती है। इसकी हरी पत्तियों को विभिन्न व्यंजनों में डालने से व्यंजनों के स्वाद एवं सुगंध में बढ़ोतरी होती है। इसके साथ ही इसके बीज को मसाले की तरह इस्तेमाल किया जाता है। हमारे देश में मध्यप्रदेश में इसकी बड़े पैमाने पर खेती की जाती है। मध्य प्रदेश के अलावा इसकी खेती राजस्थान आंध्र प्रदेश बिहार उत्तर प्रदेश एवं कर्नाटक में भी सफलतापूर्वक की जाती है। अगर आप भी करना चाहते हैं धनिया की खेती तो इस की उन्नत किस्मों की जानकारी होना आवश्यक है। आइए धनिया की अधिक पैदावार देने वाली किस्मों की जानकारी प्राप्त करें।

धनिया की कुछ उन्नत किस्में

  • कुंभराज : इस किस्म के दाने छोटे आकार के होते हैं। पौधों में सफेद रंग के फूल आते हैं। पौधों की ऊंचाई मध्यम होती है। इस किस्म के पौधे उकठा रोग एवं भूतिया रोग के प्रति सहनशील है। फसल को पक कर तैयार होने में 115 से 120 दिनों का समय लगता है। प्रति एकड़ खेत में खेती करने के लिए 5.6 से 6 क्विंटल तक पैदावार होती है।

  • सिम्पो एस 33 : इस किस्म के पौधे मध्यम ऊंचाई के होते हैं। दाने बड़े एवं अंडाकार होते हैं। इस किस्म के पौधे उकठा रोग,  स्टेमगाल रोग एवं भभूतिया रोग के प्रति सहनशील है। फसल को पक कर तैयार होने में 140 से 150 दिन का समय लगता है। प्रति एकड़ भूमि में खेती करने पर 7.2 से 8 क्विंटल तक पैदावार होती है।

  • आर सी आर 728 : यह किस्म सिंचित एवं असिंचित दोनों क्षेत्रों में खेती के लिए उपयुक्त है। हरी पत्तियों के लिए इसकी प्रमुखता से खेती की जाती है। इस किस्म के पौधों में गोल दाने होते हैं। यह किस्म भभूतिया रोगएवं स्टेमगाल रोग के प्रति सहनशील है। फसल को पक कर तैयार होने में 125 से 130 दिनों का समय लगता है। प्रति एकड़ खेत में खेती करने पर 5.6 से 6 क्विंटल तक पैदावार होती है।

  • आर सी आर 446 : असिंचित क्षेत्रों में खेती के लिए यह उपयुक्त किसमें है। इस किस्म के पौधे मध्यम ऊंचाई के होते हैं एवं शाखाएं सीधी होती हैं। दानों का आकार भी मध्यम होता है। इस किस्म के पौधों में पत्तियां अधिक आती हैं। हरी पत्तियां प्राप्त करने के लिए इस किस्म की खेती प्रमुखता से की जाती है। इस किस्म के पौधों में उकठा रोग, स्टेमगाल रोग एवं भभूतिया रोग का प्रकोप कम होता है। फसल को पक कर तैयार होने में 110 से 130 दिनों का समय लगता है। प्रति एकड़ खेत में खेती करने पर 4.1 से 5.2 क्विंटल तक पैदावार होती है।

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