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अधिक पैदावार के लिए जरूरी है गेहूं की सही तरीके से बुवाई

अधिक पैदावार के लिए जरूरी है गेहूं की सही तरीके से बुवाई

लेखक - Soumya Priyam | 17/11/2022

गेहूं की फसल भारत की अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख भूमिका निभाती है और पूरे देश के लगभग 125216 हेक्टेयर क्षेत्रफल भाग पर बोई जाती है। भारत में नवंबर मध्य तक लगभग सभी गेहूं उगाने वाले क्षेत्रों में बुवाई की प्रक्रिया पूर्ण रूप से पूरी कर ली जाती है, इसके अलावा कुछ-कुछ गेहूं उत्पादक क्षेत्र ऐसे भी हैं जहां अधिक बारिश के कारण बुवाई दिसंबर माह तक का समय ले सकती है। देर से बुवाई वाले इन क्षेत्रों में मुख्यतः पछेती किस्म के बीजों का प्रयोग किया जाता है।

खरीफ की फसल की कटाई के बाद खेतों को गेहूं की फसल के लिए तैयार किया जाता है, इसके लिए किसान पकी विघटित गोबर की खाद को खेत में बिखेर देते हैं और हल्की गहरी जुताई कर रोटावेटर से भूमि को समतल बना लेने जैसी आवश्यक कार्यों को पूर्ण करते हैं।

गेहूं में अगेती एवं पछेती किस्मों के आधार पर बीज दर सामान्यतः भिन्न-भिन्न होती है। अगेती गेहूं की बुवाई के लिए बीज दर 45 से 50 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर की आवश्यकता होती है वहीं पछेती गेहूं की बुवाई में यह 10 किलोग्राम दर की मात्रा से बढ़ जाती है। बीज 3 से 4 सेंटीमीटर गहराई पर मिट्टी में बोये जाते हैं, इसके अलावा 22.5 सेंटीमीटर पंक्ति से पंक्ति की दूरी तथा 8 से 10 सेंटीमीटर पौधे से पौधे की दूरी को बीज बुवाई का आदर्श मानक माना गया है। बीज को बुवाई से पहले बीज उपचार की प्रक्रिया से भी गुजारा जाता है जिसके लिए प्रति किलोग्राम बीज दर के अनुसार 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम की मात्रा का उपयोग कृषि विशेषज्ञों द्वारा सुझाया गया है।

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आशा है गेहूं में बुवाई संबंधित यह जानकारी आपके लिए उपयोगी सिद्ध रही होगी। गेहूं की बेहतर उपज के लिए आप किसान ‘’देहात ‘’ कंपनी की गेहूं की किस्म DWS -777, 187, 343, 154, 555 को इस वर्ष अपने खेत में लगा सकते हैं। इन सभी किस्मों में अन्य किस्मों की अपेक्षा रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है, जो न फसल को रोगों एवं कीटों से बचाने में आपकी मदद करती हैं बल्कि फसल को बेहतर बनाने के साथ अधिक उपज देने के लिए भी जानी जाती हैं। किस्मों से जुड़ी अधिक जानकारी आप हमारे टोल फ्री नंबर 1800-1036-110 पर कॉल करके हमारे कृषि विशेषज्ञ से जुड़कर ले सकते हैं।


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