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अब मामूली सा टिंडा आपको बनाएगा मालामाल, जानिए उन्नत खेती की विधि

Author : Surendra Kumar Chaudhari

भारत में टिंडे की खेती मुख्यतः दिल्ली, हरियाणा, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश के इलाकों में की जाती है। गर्म जलवायु में होने वाला यह पौधा अपने में सूखी खांसी और रक्त संचार सुधारने जैसे औषधीय गुण समाए हुए है। इसके अलावा बहुत ही कम लागत में टिंडे की खेती से किसान अधिक पैदावार एवं बेहतर आय प्राप्त कर सकते हैं। अगर आप भी टिंडे की खेती के उन्नत तरीके सीख कर एक बेहतर आय का साधन प्राप्त करना चाहते हैं तो यह आर्टिकल आपके लिए मददगार सिद्ध हो सकती है।

टिंडे की खेती के लिए उपयुक्त समय

  • टिंडे की ग्रीष्मकालीन फसल के लिए फरवरी से मार्च महीने में बुवाई करें।

  • टिंडे की वर्षा कालीन फसल के लिए जून से जुलाई का महीना उपयुक्त है।

  • बीज के अंकुरण के लिए 27 से 30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान होना चाहिए।

टिंडे की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी और जलवायु

  • टिंडे की खेती के लिए गर्म और आद्र जलवायु की आवश्यकता होती है।

  • टिंडे की खेती के लिए बलुई दोमट या दोमट मिट्टी उपयुक्त है।

  • टिंडे के लिए भूमि का पीएच मान 6 से 7 के बीच में होना चाहिए।

  • इसके अलावा नदियों के किनारे और अम्लीय भूमि में भी इसकी खेती की जा सकती है।

टिंडे की खेती के लिए बिजाई की विधि

  • प्रति एकड़ 1.5 किलो बीज की मात्रा उपयुक्त होती है।

  • बिजाई से पहले 12 से 24 घंटे तक बीजों को पानी में भिगो कर रखें।

  • टिंडे की बुवाई थालों में करें।

  • सभी कतारों के बीच करीब 2 से 2.5 मीटर की दूरी होनी चाहिए।

  • सभी थालों के बीच की दूरी करीब 1 से 1.5 मीटर होनी चाहिए।

  • सभी थाले में करीब 4 से 5 बीज की बुवाई करें।

  • बीज अंकुरित होने के बाद प्रत्येक थाले में केवल 2 स्वस्थ पौधे छोड़ें। 2 के अलावा बचे हुए सभी पौधों को उखाड़ कर अलग करें।

टिंडे की खेती में सिंचाई और उर्वरक प्रबंधन

  • पहली सिंचाई बिजाई के 2 से 3 दिन के अंतर पर करें।

  • अधिक पैदावार के लिए सिंचाई बौछारी (स्प्रिंकल) विधि से करें।

  • ग्रीष्मकालीन फसल के लिए 4 से 7 दिन के अंतराल पर तथा वर्षा कालीन फसल में आवश्यकता पड़ने पर सिंचाई करें।

  • टिंडे की बेहतर पैदावार के लिए 90 किलोग्राम यूरिया, 125 किलोग्राम सिंगल सुपर फासफेट एवं 35 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश की आवश्यकता होती है।

  • नाइट्रोजन की केवल ⅓ मात्रा का प्रयोग बिजाई के समय करें। बाकी बची नाइट्रोजन की मात्रा का प्रयोग शुरुआती विकास के समय डालें।

  • खेती के तैयारी को समय 60 से 80 क्विंटल गोबर की खाद प्रति एकड़ डालें।

ऊपर दी गयी जानकारी पर अपने विचार और कृषि संबंधित सवाल आप हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर भेज सकते हैं। यदि आपको आज के पोस्ट में दी गई जानकारी उपयोगी लगी हो, तो इसे लाइक और अपने किसान मित्रों के साथ शेयर करना न भूलें। साथ ही कृषि संबंधित ज्ञानवर्धक और रोचक जानकारियों के लिए जुड़े रहें देहात से।

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23 March 2022

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