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आलू की खेती से पहले जानें संकर एवं उन्नत किस्मों की विशेषताएं

Author : Surendra Kumar Chaudhari

आलू गेहूं, धान एवं मक्का के बाद सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली फसल है। विश्व में आलू के उत्पादन में भारत को तीसरा स्थान प्राप्त है। इसकी खेती मैदानी एवं पर्वतीय दोनों क्षेत्रों में की जा सकती है। आलू में विटामिन सी, बी कॉम्पलेक्स, आयरन, कैल्शियम, मैंगनीज, फास्फोरस आदि कई पोषक तत्त्व होते हैं। हमारे देश में ज्यादातर लोगों की पसंदीदा सब्जियों में आलू शामिल होने के कारण बाजार में इसकी मांग भी हमेशा बनी रहती है। अगर आप करना चाहते हैं आलू की खेती तो इसकी कुछ संकर एवं उन्नत किस्मों की जानकारी यहां से प्राप्त करें।

आलू की कुछ संकर किस्में

  • कुफरी जवाहर : यह एक संकर किस्म है। इस किस्म के पौधों की ऊंचाई 45 से 55 सेंटीमीटर होती है। फसल को तैयार होने में 90 से 110 दिनों का समय लगता है। यह किस्म अगेती झुलसा रोग एवं फोमा रोग के लिए प्रतिरोधी है। प्रति एकड़ भूमि में खेती करने पर 100 से 120 क्विंटल तक पैदावार होती है।

  • कुफरी अशोक : यह संकर किस्मों में शामिल है। आलू की अगेती खेती के लिए यह उपयुक्त किस्म है। इस किस्म के पौधों की ऊंचाई 60 से 80 सेंटीमीटर होती है। इसके कंदों का रंग सफेद होता है। फसल को तैयार होने में करीब 75 दिनों का समय लगता है। प्रति एकड़ खेत से 92 से 112 क्विंटल तक पैदावार प्राप्त किया जा सकता है।

  • जे ई एक्स सी 166 : यह मध्यम अवधि में तैयार होने वाली संकर किस्म है। कंदों की रोपाई के करीब 90 दिनों बाद फसल तैयार हो जाती है। प्रति एकड़ भूमि में खेती करने पर 120 क्विंटल तक आलू की पैदावार होती है।

आलू की कुछ उन्नत किस्में

  • कुफरी ज्योति : पर्वतीय क्षेत्रों में खेती के लिए यह उपयुक्त किस्म है। हालांकि मैदानी क्षेत्रों में भी इसकी खेती की जा सकती है। इस किस्म के कंद अंडाकार एवं सफेद रंग के होते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में फसल को तैयार होने में 130 से 150 दिनों का समय लगता है। मैदानी क्षेत्रों में अधिक समय तक मिट्टी में रहने से कंद फटने लगते हैं, इसलिए 80 दिनों में ही फसल की खुदाई कर लेनी चाहिए। प्रति एकड़ खेत में खेती करने पर

  • कुफरी देवा : यह किस्म पछेती बुवाई के लिए उपयुक्त है। इस किस्म के कंद अंडाकार एवं सफेद रंग के होते हैं और आंखों के पास हल्का गुलाबी रंग होता है। इस किस्म के कंदों में सड़ने की समस्या कम होती है। यह किस्म पाला (अधिक ठंड) सहन कर सकते हैं। फसल को तैयार होने में 120 से 125 दिनों का समय लगता है। प्रति एकड़ भूमि से 120 से 160 क्विंटल तक पैदावार होती है।

  • कुफरी शीतमान : इस किस्म की खेती मैदानी क्षेत्रों के साथ पर्वतीय क्षेत्रों में भी की जा सकती है। इस किस्म के कंदों का रंग सफेद होता है एवं कंद अंडाकार होते हैं। इस किस्म की विशेषता यह है कि यह किस्म पाला (अधिक ठंड) सहन करने में सक्षम है। मैदानी क्षेत्रों में फसल को तैयार होने में 100 से 110 दिनों का समय लगता है। वहीं पर्वतीय क्षेत्रों में 125 से 130 दिनों फसल खुदाई के लिए तैयार हो जाती है। प्रति एकड़ भूमि में खेती करने पर 100 क्विंटल तक आलू प्राप्त किया जा सकता है।

इन किस्मों के अलावा हमारे देश में आलू की कई अन्य किस्मों की खेती भी बड़े पैमाने पर की जाती है। जिनमें कुफरी स्वर्ण, कुफरी लालिमा, कुफरी बादशाह, कुफरी नवताल, कुफरी सतलुज, जे एफ 5106, आदि किस्में शामिल हैं।

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7 September 2021

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