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Manish Mohan Kamble

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6 June 2021
मिर्च की उन्नत खेती उपयुक्त जलवायु मिर्च की फसल के लिए गर्म तथा आर्द्र जलवायु लाभकारी हैं| इसके पौधे के लिये अत्यधिक ठंड व गर्मी दोनों ही हानिकारक हैं| इसकी खेती हर प्रकार की जलवायु में आसानी से की जा सकती है| वर्षा आधारित फसल के लिए 100 सेन्टीमीटर वर्षा वाले क्षेत्रों में भी आसानी से उगाया जा सकता है| अंकुरण से बढ़वार के लिए 17 से 21 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान मिर्च का अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए अनुकूल रहता है| मिर्च की फसल में फूल व फल आने के समय गर्म हवायें हानिकारक होती है| मिर्च पर पाले का प्रकोप अधिक होता है| अतः पाले की आशंका वाले क्षेत्रों में इसकी अगेती फसल ली जा सकती हैं| भूमि चयन मिर्च को अच्छे जल-निकास वाली प्रायः सभी प्रकार की भूमि में पैदा किया जा सकता है| फिर भी जीवांशयुक्त दोमट या बलुई मिटटी जिसमें कार्बनिक पदार्थ की मात्रा अधिक हो सबसे उपुयक्त होती है| लवण और क्षार युक्त भूमि इसके लिए उपयुक्त नहीं है| लवण वाली भूमि इसके अंकुरण और प्रारंभिक विकास को प्रभावित करती हैं| मिर्च के लिए मिटटी का पी एच मान 6.5 से 7.5 सर्वोतम है, लेकिन इसको 8 पी एच मान (वर्टीसोल्स) वाली मिटटी में भी उगाया जा सकता है| उन्नतशील किस्में मिर्च की उन्नत फसल के लिए सामान्य व संकर किस्मों की क्षमता के अनुसार उत्पादन ले पाना तभी संभव है| जब उसके लिए उचित प्रबंधन एवं अनुकूल जल व मिटटी और अपने क्षेत्र की प्रचलित किस्म उपलब्ध हो| इसलिए किसानों को अपने क्षेत्र की प्रचलित और अधिकतम पैदावार वाली किस्म का चयन करना चाहिए| साथ में किस्मों में विकार रोधी क्षमता भी आवश्यक है| कुछ प्रचलित सामान्य व संकर किस्में इस प्रकार है, जैसे- मसाले वाली किस्में– पूसा ज्वाला, पन्त सी- 1, एन पी- 46 ए, जहवार मिर्च- 148, कल्याणपुर चमन, भाग्य लक्ष्मी, आर्को लोहित, पंजाब लाल, आंध्रा ज्योति और जहवार मिर्च- 283 आदि प्रमुख है| आचार वाली किस्में– केलिफोर्निया वंडर, चायनीज जायंट, येलो वंडर, हाइब्रिड भारत, अर्का मोहिनी, अर्का गौरव, अर्का मेघना, अर्का बसंत, सिटी, काशी अर्ली, तेजस्विनी, आर्का हरित और पूसा सदाबहार (एल जी- 1) आदि प्रमुख है| उपज / उत्पादन (क्वि./हे .) – काशी अनमोल (उपज 250 क्वि. / हे.), काशी विश्वनाथ (उपज 220 क्वि./ हे.), जवाहर मिर्च – 283 (उपज 80 क्वि. / हे हरी मिर्च.) जवाहर मिर्च -218 (उपज 18-20 क्वि. / हे सूखी मिर्च.) अर्का सुफल (उपज 250 क्वि. / हे.) तथा संकर किस्म काशी अर्ली (उपज 300-350 क्वि. / हे.), काषी सुर्ख या काशी हरिता (उपज 300 क्वि. / हे.) का चयन करें। पब्लिक सेक्टर की एचपीएच-1900, 2680, उजाला तथा यूएस-611, 720 संकर किस्में की खेती की जा रही है। काशी अनमोल (उपज 250 क्वि. / हे.), काशी विश्वनाथ (उपज 220 क्वि./ हे.), जवाहर मिर्च – 283 (उपज 80 क्वि. / हे हरी मिर्च.) जवाहर मिर्च -218 (उपज 18-20 क्वि. / हे सूखी मिर्च.) अर्का सुफल (उपज 250 क्वि. / हे.) तथा संकर किस्म काशी अर्ली (उपज 300-350 क्वि. / हे.), काषी सुर्ख या काशी हरिता (उपज 300 क्वि. / हे.) का चयन करें। पब्लिक सेक्टर की एचपीएच-1900, 2680, उजाला तथा यूएस-611, 720 संकर किस्में की खेती की जा रही है। बीज दर मिर्च की ओ पी किस्मों की 1.0 से 1.50 किलोग्राम तथा संकर (हायब्रिड) किस्मों की 250 से 350 ग्राम बीज की मात्रा एक हेक्टेयर क्षेत्र की नर्सरी तैयार करने के लिए पर्याप्त होती है| मिर्च की पौध तैयार करना तथा नर्सरी प्रबंधन मिर्च की पौध तैयार करने के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करें जहाँ पर पर्याप्त मात्रा में धूप आती हो तथा बीजो की बुवाई 3 गुणा 1 मीटर आकार की भूमि से 20 सेमी ऊँची उठी क्यारी में करें। मिर्च की पौधषाला की तैयारी के समय 2-3 टोकरी वर्मी कंपोस्ट या पूर्णतया सड़ी गोबर खाद 50 ग्राम फोटेट दवा / क्यारी मिट्टी में मिलाऐं। बुवाई के 1 दिन पूर्व कार्बन्डाजिम दवा 1.5 ग्राम/ली. पानी की दर से क्यारी में टोहा करे। अगले दिन क्यारी में 5 सेमी दूरी पर 0.5-1 सेमी गहरी नालियाँ बनाकर बीज बुवाई करें। नर्सरी एवं रोपाई समय रोपाई की तकनीक एवं समय  – मिर्च की रोपाई वर्षा, शरद, ग्रीष्म तीनों मौसम  मे की जा सकती है। परन्तु मिर्च की मुख्य फसल खरीफ (जून-अक्टू.) मे तैयार की जाती है। जिसकी रोपाई जून.-जूलाई मे, शरद ऋतु की फसल की रोपाई सितम्बर-अक्टूबर तथा ग्रीष्म कालीन फसल की रोपाई फर-मार्च में की जाती है। पोषक तत्व प्रबंधन तकनीक  – मिर्च की फसल मे उर्वकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करे। सामन्यतः एक हेक्टेयर क्षेत्रफल मे 200-250 क्वि गोबर की पूर्णतः सडी हुयी खाद या 50 क्वि. वर्मीकंपोस्ट खेत की तैयारी के समय मिलायें। नत्रजन 120-150 किलों, फास्फोरस 60 किलो तथा पोटाष 80 किलो का प्रयोग करे। बीज की मात्रा – मिर्च की ओ.पी. किस्मों के 500 ग्राम तथा संकर (हायब्रिड) किस्मों के 200-225 ग्राम बीज की मात्रा एक हेक्टेयर क्षेत्र की नर्सरी तैयार करने के लिए पर्याप्त होती है। मिर्च की रोपाई वर्षा, शरद, ग्रीष्म तीनो मौसम में की जा सकती है| परन्तु मिर्च की मुख्य फसल खरीफ जून से अक्तूबर मे तैयार की जाती है| जिसकी रोपाई जून से जुलाई मे, शरद ऋतु की फसल की रोपाई सितम्बर से अक्टूबर और ग्रीष्म कालीन फसल की रोपाई फरवरी से मार्च में की जाती है| रोपाई के लिये पौध 25 से 35 दिनों से अधिक पुरानी नही होनी चाहिए अर्थात नर्सरी में बीज की बुवाई मुख्य खेत में रोपाई के 4 से 5 सप्ताह पहले करें| नर्सरी की तैयारी मिर्च की पौधशाला तैयार करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए, जैसे- मिर्च की पौधशाला की तैयारी के समय 2 से 3 टोकरी वर्मीकंपोस्ट या पूर्णतया सड़ी गोबर खाद 50 ग्राम फोरेट दवा प्रति क्यारी की मिट्टी में मिलाएं| मिर्च की पौध तैयार करने के लिए बीजों की बुवाई 3 गुणा 1 मीटर आकार की भूमि से 15 सेंटीमीटर उँची उठी क्यारी में करें| बुवाई के 1 दिन पूर्व कार्बन्डाजिम दवा 1.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से क्यारी को तर करे| घरेलू बीज इस्तेमाल कर रहे किसानों को सलाह है, कि वो बीज को थायरम 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें| अगले दिन क्यारी में 5 सेंटीमीटर दूरी पर 0.5 से 1 सेंटीमीटर गहरी नालियाँ बनाकर बीज बुवाई करें| बीज बोने के बाद गोबर खाद, मिटटी व बालू (1:1:1) मिश्रण से ढकने के बाद क्यारियों को धान के पुआल, सूखी घास या पलाष के पत्तों से ढकें| अंकुरण के 10 दिन बाद कापर आक्सीक्लोराइड की 2 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें| सिचाई प्रबंधन मिर्च की फसल को मिट्टी की किस्म, भूमि के प्रकार व वर्षा के आधार पर सिंचाई कर सकते हैं। यदि वर्षा कम हो रही हो तो 10 से 15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करना चाहिए| यदि मिट्टी दोमट मिट्टी हो तो 10 से 12 दिन के अंतराल पर और ढालू भूमि पर 10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करना चाहिए| मिर्च की फसल में फूल व फल बनते समय सिंचाई करना अत्यन्त आवष्यक हैं| इस स्थिति में सिंचाई न करने पर मिर्च के फल व फूल छोटी अवस्था में गिर जाते हैं| इसके साथ ही मिर्च की फसल में पानी नही रूकने देना चाहिए| मल्चिंग का प्रयोग मिर्च फसल की आधुनिक खेती में सिंचाई के लिए ड्रिप पद्धति लगायी जा रही है और भूमि से नमीं की हानि रोकने के लिए मल्चिंग का उपयोग किया जाता हैं| मल्चिंग काफी पुरानी पद्धति है| इसमें किसान खेत की नमी बचाने का प्रयत्न करते हैं| पहले किसान खेत में सूखे पत्ते, भूसे इत्यादि के द्वारा नमी बचाने का प्रयत्न करते थे| आधुनिक कृषि में सूखे पत्ते, भूसे इत्यादि के स्थान पर प्लास्टिक शीट का इस्तेमाल करते हैं| खरपतवार नियंत्रण के लिए 30 माइक्रोन मोटाई वाली अल्ट्रावायलेट रोधी प्लास्टिक मल्चिंग शीट का प्रयोग किया जाता हैं| जिससे खरपतवार प्रबंधन के साथ-साथ कम सिंचाई जल के उपयोग से बेहतर उत्पादन लिया जा सकता हैं| मल्चिंग के लाभ- मल्चिंग के उपयोग से पानी की बचत, निंदाई-गुड़ाई के खर्च की बचत होती है, मिर्च के उत्पादन व गुणवत्ता में वृद्धि होती हैं| निम्नतम सिंचाई व्यवस्था होने पर भी लाभ लिया जा सकता हैं| फर्टीगेशन तकनीक द्वारा पोषक तत्व प्रबंधन- मिर्च के पौधे, जिनको ऊठी हुई क्यारी पर लगाया गया हो, ड्रिप सिंचाई व्यवस्था का उपयोग करें और जल विलेय उर्वरकों जैसे 19:19:19 को सिंचाई जल के साथ ड्रिप में देने से उर्वरक की बचत के साथ साथ उसकी उपयोग क्षमता में भी वृद्धि होती है तथा पौधों को आवष्यकतानुसार व शीघ्र पोषक तत्व उपलब्ध होने से उत्पादन तथा गुणवत्ता दोनों में वृद्धि होती है| मिर्च में पादप वृद्धि हार्मोन्स का प्रयोग मिर्च की फसल में प्लैनोफिक्स 10 पी पी एम का पुष्पन के समय तथा उसके 3 सप्ताह बाद छिड़काव करने से शाखाओं की संख्या में वृद्धि होती है एवं फल अधिक लगते हैं | तथा रोपाई के 18 एवं 43 दिन के बाद ट्राई केटेनॉल १ पी पी एम की ड्रेन्चिंग करने से पौधों की अच्छी वृद्धि होती है  जिब्रेलिक एसिड 10-100 पी पी एम सांद्रता को घोल के फल लगने के बाद छिड़काव करने से फल ज्यादा लगते हैं | पोषक तत्व प्रबंधन मिर्च की फसल में उर्वकों का प्रयोग मिटटी परीक्षण के आधार पर करें| सामन्यतः एक हेक्टेयर क्षेत्रफल मे 25 से 30 टन गोबर की पूर्णतः सड़ी हुयी खाद या 5 से 6 टन वर्मीकंपोस्ट खेत की तैयारी के समय मिलायें| नत्रजन 120 से 150 किलोग्राम, फास्फोरस 60 किलोग्राम तथा पोटाष 80 किलोग्राम का प्रयोग करें
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