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Rahul Somra

Rahul Somra

20 February 2021
हरी खाद का उपयोग कर भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाएं !!! हरी खाद को एक शुद्ध फसल के रूप में खेत की उपजाऊ शक्ति, भूमि के पोषक और जैविक पदार्थो की पूर्ति करने के उदेश्य से की जाती है| इस प्रकार की फसलों को हरियाली की ही अवस्था में हल या किसी अन्य यंत्र से उसी खेत की मिट्टी में मिला दिया जाता है| हरी खाद से भूमि का संरक्षण होता है और खेत की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है| आज कल भूमि में लगातार फसल चक्र से उस खेत में उपस्थित फसल की पैदावार और बढवार के लिए आवश्यक तत्व नष्ट होते जाते है| इनकी आपूर्ति और पैदावार को बनाए रखने के लिए हरी खाद एक अच्छा विकल्प हो सकता है| हरी खाद के लिए बनी किस्मे, दलहनी फसले या अन्य फसलों को हरी अवस्था में जब भूमि की नाइट्रोजन और जीवाणु की मात्रा को बढ़ाने के लिए खेत में ही दबा दिया जाता है तो इस प्रक्रिया को हरी खाद देना कहते है| हरी खाद वाली फसलें हरी खाद वाली खरीफ की फसलें लोबिया, मुंग, उड़द, ढेचा, सनई व गवार हरी खाद की फसल से अधिकतम कार्बनिक पदार्थ और नाइट्रोजन प्राप्त करने के लिए एक विशेष अवस्था में उसी खेत में दबा देना चाहिए| इन फसलों को 30 से 50 दिन की अवधि में ही पलट देना चाहिए| क्योंकी की इस अवधि में पौधे नरम होते है जल्दी गलते है| हरी खाद के लिए रवि की फसलें बरसीम, सैंजी, मटर और चना आदि फसलों का प्रयोग किया जा सकता है और कम लागत में भूमि के लिए अच्छे कार्बनिक पदार्थ प्राप्त हो सकते है| अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों या जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है उसके लिए सनई और लोबिया को उपयोग में लाना चाहिए और कम वर्षा व जल वाली भूमि के लिए ढेंचा और ग्वार को महत्व देना चाहिए| दलहनी फसलों को उस जगह उपयोग में लाए जहा पानी ना ठरता हो| क्षारीय और समस्याग्रस्त क्षेत्रों के लिए ढेंचा और लोबिया उपयोग में लाना चाहिए| हरी खाद का वर्गीकरण हरी खाद को प्रयोग करने के आधार पर दो वर्गों में बाँटा जा सकता है| उसी स्थान पर उगाई जाने वाली हरी खाद: भारत के अधिकतर क्षेत्र में यह विधि अधिक लोकप्रिय है इसमें जिस खेत में हरी खाद का उपयोग करना है उसी खेत में फसल को उगाकर एक निश्चित समय पश्चात् पाटा चलाकर मिट्टी पलटने वाले हल से जोतकर मिट्टी में सड़ने को छोड़ दिया जाता है| वर्तमान समय में पाटा चलाने व हल से पलटाई करने के बजाय रोटा वेटर का उपयोग करने से खड़ी फसल को मिट्टी में मिला देने से हरे पदार्थ का विघटन शीघ्र व आसानी से हो जाता है| अपने स्थान से दूर उगाई जाने वाली हरी खाद की फसलें: विधि भारत में अधिक प्रचलित नहीं है, परन्तु दक्षिण भारत में हरी खाद की फसल अन्य खेत में उगाई जाती है, और उसे उचित समय पर काटकर जिस खेत में हरी खाद देना रहता है उसमें जोत कर मिला दिया जाता है| इस विधि में जंगलों या अन्य स्थानों पर पेड़ पौधों, झाड़ियों आदि की पत्तियों, टहनियों आदि को इकट्ठा करके खेत में मिला दिया जाता अहि| हरी खाद के लाभ यह खाद केवल नाइट्रोजन और कार्बनिक पदार्थो की ही आपूर्ति नही करती है बल्कि इससे भूमि को कई पोषक तत्व भी प्राप्त होते है| इसे प्राप्त होने वाले पदार्थ इस प्रकार है नाइट्रोजन, गंधक, स्फुर, पोटाश, मैग्नीशियम, कैल्शियम, तांबा, लोहा और जस्ता इत्यादि| इसके उपयोग से भूमि में सूक्ष्मजीवों की संख्या और क्रियाशीलता बढ़ती है, तथा मिट्टी की उर्वरा शक्ति व उत्पादन क्षमता में भी बढ़ोतरी देखने को मिलती है| हरी खाद के प्रयोग से मिट्टी नरम होती है, हवा का संचार होता है, जल धारण क्षमता में वृद्धि, खट्टापन व लवणता में सुधार तथा मिट्टी क्षय में भी सुधार आता है| भूमि को को इस खाद (Green Manure) से मृदा जनित रोगों से भी छुटकारा मिलता है| किसानों के लिए कम लागत में अधिक फायदा हो सकता है, स्वास्थ और पर्यावरण में भी सुधार होता है| यह खरपतवारों की वृद्धि रोकने मने भी सहायक हैं| हरी खाद की बुवाई का समय हमारे देश में विभिन्न प्रकार की जलवायु पाई जाती है| अतः सभी क्षेत्रों के लिए हरी खाद की फसलों की बुवाई का एक समय निर्धारत नहीं किया जा सकता है| परन्तु फिर भी यह कह सकते हैं कि उपरोक्त सारणी के अनुसार अपने क्षेत्र के लिए अनुकूल फसल का चयन करके, बुबाई वर्षा प्रारंभ होने के तुरन्त बाद कर देनी चाहिए तथा यदि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो तो हरी खाद की बुवाई वर्षा शुरू होने के पूर्व कर देनी चाहिए| हरी खाद के लिए फसल की बुबाई करते समय खेत में पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है| बीज दर हरी खाद वाली फसलों की बुवाई हेतु बीज की मात्रा बीज के आकार पर निर्भर करती है| जिन फसलों के बीज छोटे होते हैं उनमें बीज दर 25-30 किलोग्राम तथा बड़े आकार वाली किस्मों का बीज दर 40-50 किलोग्राम/हैक्टेयर तक पर्याप्त होता है| हरी खाद बोने के समय 80 किलोग्राम नत्रजन 40-60 किलोग्राम/हैक्टेयर सल्फर मृदा में मिला देना चाहिए| इसके बाद जो दूसरी फसल लेनी हो उसमें सल्फर की मात्रा देने की आवश्यकता नहीं होती तथा नत्रजन में भी 50% तक की बचत की जा सकती है| जब फसल की वृद्धि अच्छी हो गई हो तथा फूल आने के पूर्व इसे हल या डिस्क हैरो द्वारा खेत में पलट कर पाटा चला देना चाहिए यदि खेत में 5-6 से.मी. पानी भरा हो तो पलटने व मिट्टी में दबाने में कम मेहनत लगती है| जुताई उसी दिशा में करनी चाहिए जिसमें पौधों के अपघटन में सुविधा होती यदि पौधों को दबाते समय खेत में पानी की कमी हो या देरी से जुताई की जाती है तो पौधों के अपघटन में अधिक समय लगता है| साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि किस इसके बाद लगाई जाने वाली फसल में आधार नत्रजन की मात्रा नहीं दी जानी चाहिये| यह विधि उस खेत में प्रयोग की जाती है जहाँ पानी की प्रचुर की मात्रा हो| यदि पानी की मात्रा पर्याप्त नहीं है तो वहाँ हरीखाद की फसल एक क्षेत्र में उगाकर उसकी पत्तियां व तना दूसरे क्षेत्र में ले जाकर दबाते हैं| हरी खाद फसल के आवश्यक गुण फसल ऐसी हो जिसमें शीघ्र वृद्धि की क्षमता जिससे न्यूनतम समय में कार्य पूर्ण हो सके| चयन की गई दलहनी फसल में अधिकतम वायुमंडल नाइट्रोजन का यौगिकीकरण करने की क्षमता होनी चाहिए जिससे जमींन को अधिक से अधिक नत्रजन उपलब्ध हो सके| फसल की वृद्धि होने पर अति शीघ्र, अधिक से अधिक मात्रा में पत्तियां व कोमल शाखाएं निकल सकें जिससे कि प्रति इकाई क्षेत्र से अत्यधिक हरा पदार्थ मिल सकें तथा आसानी से सड़ सके| फसल गहरी जड़ वाली हो जिससे वह जमीन में गहराई तक जाकर अधिक से अधिक पोषक तत्वों को खीच सके| हरी खाद की फसल को सड़ने पर उसमें उपलब्ध सारे पोषक तत्व मिट्टी की ऊपरी सतह पर रह जाते हैं जिनका उपयोग बाद में जाने वाली मुख्य फसल के द्वारा किया जाता है| फसल के वानस्पतिक भाग मुलायम होने चाहिए| फसल की जल व पोषक तत्वों की मांग कम से कम होनी चाहए| फसल जलवायु की विभिन्न परिस्थितियों जैसे अधिक ताप, कम ताप, कम या अधिक वर्षा सहन करने वाली हो| हरी खाद देने की विधियाँ हरी खाद की स्थानीय विधि- इस विधि में हरी खाद की फसल की उसी खेत में उगाया जाता है जिसमें हरी खाद का उपयोग करना होता है| यह विधि समुचित वर्षा अथवा सुनिश्चित सिंचाई वाले क्षेत्रों में अपनाई जाती है| इस विधि में फूल आने से पूर्व वानस्पतिक वृद्धिकाल (45-60 दिन) में मिट्टी में पलट दिया जाता है| मिश्रित रूप से बोई गई हरी खाद की फसल को उपयुक्त समय पर जुताई द्वारा खेत में दबा दिया जाता है| हरी पत्तियों की हरी खाद- जलवायु एवं मृदा दशाओं के आधार पर उपयूक्त फसल की चुनाव करना आवश्यक होता है| जलमग्न तथा क्षारीय एवं लवणीय मृदा में ढैंचा तथा सामान्य मृदाओं में सनई एवं ढैंचा दोनों फसलों से अच्छी गुणवत्ता वाली हरी खाद प्राप्त होती है| हरी खाद के प्रयोग के बाद अगली फसल की बुवाई या रोपाई का समय: जिन क्षेत्रों में धान की खेती होती है| वहाँ जलवायु नम तथा तापमान अधिक होने से अपघटन क्रिया तेज होती है| अतः खेत में हरी खाद की फसल की आयु 40-45 दिन से अधिक नहीं होनी चाहिए| समुचित उर्वरक प्रबंधन: कम उर्वरकता वाली मृदाओं में नाइट्रोजनधारी उर्वरकों का प्रयोग उपयोगी होती है, राइजोबियम कल्चर का प्रयोग करने से नाइट्रोजन स्थिरीकरण सहजीवी जीवाणुओं की क्रियाशीलता बढ़ जाती है| तो इन सब प्रक्रियाओं के द्वारा आप हरी खाद को अधिक पैदावार के लिए और मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए प्रयोग में ला सकते है और यह आप की फसल के लिए भी बेहतर है, कम लागत में इसके द्वारा अधिक मुनाफा लिया जा सकता है|
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