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Rakesh Sharma

Rakesh Sharma

1 August 2021
भारत में शुरू हुई है इस विशेष पौधे की खेती, नहीं पड़ती खाद की जरूरत और 25 दिन में तैयार हो जाती है फसल औषधीय पौधा कैमोमाइल की दुनिया के कई देशों में खेती होती है. अब अपने देश में उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के अलावा कुछ अन्य राज्यों के किसानों ने भी इसकी खेती शुरू कर दी है. कैमोमाइल की लाजवाब खुशबू और दिमाग को आराम देने का गुण इस औषधीय पौधे को बहुत ही खास बना देता है. कैमोमाइल की खेती के लिए इन बातों का रखें ध्यान अगर आप उपजाऊं जमीन पर खेती करने की सोच रहे हैं तो जाहिर है कि लाभ भी उतना ही मिलेगा. कैमोमाइल की खेती करने के लिए देसी खाद यानी गोबर की खाद या जैविक खाद को मिट्टी में मिलाकर जुताई करनी चाहिए. फिर पाटा लगाकर सूखे खेत में पौधों की बुवाई करनी चाहिए. बुवाई के साथ-साथ पानी डालना जरूरी है. अगर आप ज्यादा पैदावार हासिल करना चाहते हैं तो खेत में क्यारी जरूर बनाएं और नमी को ध्यान में रखकर सिंचाई करते रहें. कैमोमाइल की फसल जब खेत में हो तब खेत में किसी भी प्रकार का खर-पतवार नहीं रहना चाहिए. नर्सरी में बीजों में उगाकर खेत में रोपाई करने के लिए प्रति हेक्टेयर की दर से 750 ग्राम बीज की औसत रूप से जरूरत होती है. अक्टूबर-नवंबर के महीने में नर्सरी द्वारा कैमोमाइल का पौध तैयार करते हैं. पौध तैयार होने के बाद नवंबर के मध्य में कैमोमाइल की खेती के लिए 50/30 सेंटी मीटर के अंतराल पर पौधों की बुवाई करते हैं. रोपाई के 25 दिन बाद कर सकते हैं तुड़ाई किसान भाई सीधी बीजाई कर के भी कैमोमाइल की खेती कर सकते हैं, लेकिन इसमें अधिक बीज की जरूरत पड़ती है. वहीं बीजों से नर्सरी बनाकर रोपाई करने से परिणाम अच्छे मिले हैं, इसीलिए किसानों को सलाह दी जाती है कि वे इसी विधि से कैमोमाइल की खेती करें. अगर एक बार कैमोमाइल का पौधा लग गया तो किसी प्रकार के खाद की जरूरत नहीं पड़ती है. कैमोमाइल का पौधा पूरी तरह से जैविक उत्पाद है. इसी वजह से पूरी दुनिया में इसकी मांग है. कैमोमाइल के पौधे में कीट भी नहीं लगते. यहीं कारण है कि कीटनाशक के छिड़काव की जरूरत नहीं पड़ती है और न ही मिट्टी में किसी प्रकार का कीटनाशक डाला जाता है. 25 दिन बाद ही कैमोमाइल के पौधों में फूल लग जाती है और उसी समय पहली तुड़ाई कर ली जाती है. कैमोमाइल पौधों की एक फसल में 5 से 6 बार फूलों की कटाई की जा सकती है.
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